HomeFarmingMung ki kheti kese kare | मूंग की खेती कैसे करें

Mung ki kheti kese kare | मूंग की खेती कैसे करें

Mung ki kheti kese kare है जिस से 10 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा सकता Mung ki kheti किसानों के लिए बोनस खेती के जैसे है जिसमें कम समय में मूंग की खेती कर अधिक उत्पादन कर अधिक लाभ लिया जा सकता है बाजार में मूंग की कीमत भी ज्यादा रहती है । आज हम Mung ki वैज्ञानिक खेती के बारे में जानेंगे ।

Mung ki kheti kese kare –

मूँग की खेती के लिए जलवायु-

मूंग की फसल वर्ष के विभिन्न महीनों में विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाई जाती है। कुछ स्थानों पर मूंग की फसल 2000 मीटर की ऊँचाई तक उगाई जाती है। मूंग की फसल के लिए अधिक वर्षा हानिकारक होती है, परन्तु 100 सेमी वार्षिक वर्षा वाले स्थानों पर मूंग की फसल सफलतापूर्वक उगाई जाती है। 60-75 सेमी वार्षिक वर्षा वाले स्थानों पर भी मूंग की फसल सफलता से उगाई जाती है।

Mung ki kheti kese karen
Mung ki kheti kese kare

मूँग की खेती के लिए उपयुक्त भूमि –

मूंग की भूमि सम्बन्धी आवश्यकता भी उर्द के समान ही होती है। मूंग की फसल काली मिट्टी, दोमट, मटियार तथा एल्यूवियल आदि सभी प्रकार की मृदा में सफलतापूर्वक उगाई जाती है। भारी भूमियों की अपेक्षा हल्की मृदा अधिक उत्तम होती है। भारी भूमियों में जल निकास का उत्तम प्रबन्ध होना आवश्यक है। मूंग की सबसे उत्तम उपज दोमट भूमि में प्राप्त होती है।


मूंग एक दलहनी फसल है। अत: इसके लिए उत्तम मृदा उर्वरता आवश्यक नहीं है। कम उपजाऊ भूमि में भी मूंग की अच्छी उपज प्राप्त होती है।

मूंग की उन्नतशील जातियों के गुण

  1. पूसा बैसाखी—फसल अवधि 60-70 दिन, दानों का रंग हरा, ग्रीष्मकाल के लिए उत्तम, 90% फलियाँ एक साथ पक जाती हैं। टा. 44 से छाँटकर निकाली गई है। ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में उगा सकते हैं। 8-10 कु० उपज प्रति हेक्टेयर मिल जाती है।
  2. हाइब्रिड-45 (जवाहर 45)—यह जाति 65-80 दिन में पकने वाली है प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार देती है। पौधे सीधे बढ़ने वाले व पत्तियों का रंग हल्का हरा होता है। खरीफ के लिए उपयुक्त है। 10-12 कु० उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाती है।
  3. टा० 44 – फसल अवधि 60-70 दिन, हरी खाद के लिए भी उत्तम है। दाने की उपज 5-7 कु०/हेक्टेयर, संकरण (टा. 1 x टा. 47) से तैयार की गई है। ग्रीष्म व खरीफ ऋतु के लिए उपयुक्त है। पौधे छोटे व कम फैलने वाले, प्रति हेक्टेयर 8-10 कु० उपज मिल जाती है।
  4. के. 851—यह नवीन किस्म कानपुर से निकाली गई है। फसल अवधि 60-65 दिन। फलियाँ लम्बी (7-10 सेमी.) प्रत्येक फली में 10-14 मोटे तथा चमकीले बीज । सब फलियाँ लगभग एक साथ पकती हैं। ग्रीष्म व वर्षा ऋतु के लिए उपयुक्त है। 10-12 कु०/हे. उपज प्राप्त हो जाती है।

मूँग की खेती के लिए भूमि की तैयार –

भूमि की तैयारी अगेती मूंग की फसल उगाने के लिए खेत को विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं होती। 1-2 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से कर सकते हैं। बसन्त ऋतु में आलू या गन्ने के खेत खाली होने पर या गेहूँ की कटाई करके, पलेवा करके साथ के साथ मूंग की फसल बो सकते हैं।

मूँग की बीज मात्रा –

बीज-बीज सदैव प्रमाणित व फफूंदीनाशक दवाओं जैसे एप्रोसन जी० एन० या कैप्टान या जिराम या थीराम से उपचारित करके बोना चाहिए। इन रसायनों की 200-250 ग्राम मात्रा एक कुन्तल बीज को उपचारित करने के काम आती है।
मिश्रित फसल में बीज दर 8-10 किग्रा/हेक्टेयर व अकेली फसल में बीज दर 12-15 किग्रा/हेक्टेयर प्रयोग की जाती है। पंक्तियों की दूरी 40-45 सेमी तक रखी जाती है। ग्रीष्म ऋतु में बीज की दर 20 किमा/हेक्टेयर रखते हैं और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी रखते हैं।

मूंग बोने का समय व विधि-

देश के विभिन्न प्रदेशों में वर्षा और सिंचाई की सुविधाओं के आधार पर मूंग को फसल की बुवाई अलग-अलग समय पर की जाती है। उत्तरी भारत में फसल बसंत व खरीफ में उगाते हैं। कर्नाटक व आन्ध्र प्रदेश में फसल रबी में भी बोई जाती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाएँ हैं, वहाँ पर अप्रैल में गेहूं के खेत खाली होते ही पलेवा करके मूंग की बुवाई कर देते हैं। उत्तरी भारत में यह प्रचलन दिनों-दिन बढ़ रहा है। मूंग को 25 फरवरी से 15 अप्रैल तक कभी भी बोया जा सकता है।


फसल की बुआई छिटकवाँ अथवा पंक्तियों में करते हैं। पंक्तियों में बुवाई करना अच्छा रहता है। मक्का, कपास, गन्ना आदि की फसलों की पंक्तियों के बीच में, मूंग, मुख्य फसल की उपज को प्रभावित किए बिना, पैदा की जा सकती है। निचली मृदाओं में अथवा अधोसतह में अभेद परत के होने से खेत में पानी ठहरना प्रारम्भ हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में अनुसंधान के आधार पर पाया गया है कि मेढ़ पर फसल की बुवाई करने से अधिक उपज प्राप्त होती है। बीज सदैव 4-6 सेमी की गहराई पर बोया जाता है।

मूंग का बीज का उपचार-

बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना-बीज को सेरसान दवा से उपचारित करने के बाद बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें, ऐसा करने से मूंग की उपज में आशातीत वृद्धि होती है। रासायनिक विधि से बीज उपचार के लिये कार्बेंडाजिम + मेंकोजेब का 1 ग्राम प्रति 1 किलो बीज के हिसाब से उपयोग करें।

मूँग की फसल में खाद-

मूंग की फसल से अच्छी उपज लेने के लिए 20-30 किग्रा. नत्रजन; 50-60 किग्रा. फॉस्फोरस व आवश्यकतानुसार पोटाश 30-40 किया प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। खाद की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में डाल दी जाती है। मिश्रित फसल के साथ, फसल को अलग से खाद की कोई आवश्यकता नहीं होती। ग्रीष्मकालीन फसल अगर आलू या गेहूँ के बाद उगा रहे हैं तो पोषक तत्त्वों की मात्रा कम की जा सकती है ।

मूँग में सिंचाई व जल निकास-

ग्रीष्मकालीन फसल को 4-6 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। ग्रीष्मकालीन फसल में सिंचाई का बहुत अधिक महत्त्व है। वर्षाकालीन फसल में अगर सूखा पड़ जाए तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए।

मूँग की फसल में सिंचाई पद्धति उत्पादन पर सीधा असर डालती है । सिंचाई की यह वैज्ञानिक विधि उत्पादन के लिए लाभदायक है – पहली सिंचाई बुबाई के बाद , दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 15 दिन बाद, तीसरी सिंचाई दूसरी सिंचाई के 15 दिन बाद जब तक मूँग की पत्तियां खड़ी न हो जाएं , 4 एवं 5बी सिंचाई मूंग में लगातार करनी चाहिए अर्थात खेत सूख न पाए और सिंचाई हो जाये ।

मूँग की फसल में रोग एवं उनकी रोकथाम

  • पीला मोज़ेक – इस रोग के कारण नई पत्तियाँ पीली हो जाती हैं। पत्तियों की शिराओं का किनारा पीला पड़ जाता है और तत्पश्चात् पूरी पत्ती ही पीली पड़ जाती है। यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। अतः सदैव मक्खी का नियन्त्रण 0.1% थायोडान और 0.1% मैटासिस्टाक्स के छिड़काव द्वारा कर सकते हैं। छिड़काव फसल बोने के 20-25 दिन बाद में तीन-चार बार (10-15 दिन के अन्तर से) करना चाहिए।
  • वर्ण चित्ती–पत्तियों पर प्रायः वृत्ताकार व्यास के धब्बे से प्रकट होते हैं। कभी-कभी रोगग्रस्त भागों के साथ मिलने से बड़ा अनियमित आकार का धब्बा बन जाता है। धब्बों का रंग बैंगनी, लाल तथा भूरा होता है। फलियों पर भी इसका असर आ जाता है जिसके कारण फलियों का रंग काला पड़ जाता है। रोग की रोकथाम के लिए 0.2% जिनेब घोल का 7-10 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें।
  • चारकोल विगलन – इस रोग का मुख्य लक्षणं पौधे की जड़ों तथा तनों का विगलन (सड़न) है। इसकी रोकथाम के लिए बोने से पूर्व बीज को क्वीण्टोजीन से उपचारित कर लेना चाहिए। इसके अलावा मोजैक व रस्ट आदि रोग भी मूंग की फसल में लगते हैं। गेरुई के लिए 0.2 प्रतिशत जिनेब के घोल का छिड़काव करें।

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